हनुमान चालीसा ((15श्लोक)
हनुमान चालीसा के 15वें श्लोक का भावार्थ सहित विस्तृत विवेचन:
श्लोक
सहस बदन तुम्हरो जस गावे। अस कही श्रीपति कंठ लगावे।।
शब्दार्थ
सहस बदन – हजार मुखों वाले (शेषनाग)
तुम्हरो जस – तुम्हारी महिमा
गावे – गाते हैं
अस कही – ऐसा कहकर
श्रीपति – श्री लक्ष्मीपति भगवान श्रीहरि विष्ण
कंठ लगावे – गले लगाते हैं
भावार्थ
श्रीहनुमानजी की महिमा इतनी अद्भुत और अपरंपार है कि स्वयं शेषनाग (जो सहस्र मुखों से वेदों का गान करते हैं) भी उनका यश गाते हैं। भगवान विष्णु स्वयं यह कहते हैं और प्रेमपूर्वक हनुमानजी को अपने गले से लगा लेते हैं।
विस्तृत विवेचन
1. शेषनाग का गुणगान –
शेषनाग, जिनके हजार मुख हैं और जो अनंत काल से भगवान विष्णु के गुणों का गान कर रहे हैं, वे भी हनुमानजी की महिमा गाने में लीन रहते हैं। यह इंगित करता है कि हनुमानजी का यश अलौकिक और अवर्णनीय है।
2. भगवान विष्णु का प्रेम –
श्रीराम के रूप में विष्णु ने स्वयं हनुमानजी की सेवा, समर्पण और पराक्रम को देखा। जब वे कहते हैं कि शेषनाग भी हनुमानजी का यश गाते हैं, तो यह उनकी अतुलनीय भक्ति और शक्ति का प्रमाण है। इसलिए भगवान विष्णु उन्हें प्रेमपूर्वक गले लगाते हैं, जो उनकी भक्ति और निःस्वार्थ सेवा के प्रति कृतज्ञता और प्रेम का प्रतीक है।
सार
हनुमानजी केवल रामभक्त ही नहीं, बल्कि स्वयं भगवान के हृदय में बसने वाले हैं। उनका यश इतना महान है कि स्वयं शेषनाग भी उसका वर्णन करने में समर्थ नहीं हैं, और भगवान विष्णु भी उन्हें स्नेहपूर्वक अपनाते हैं।
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