गीता का पहला अध्याय
भगवद्गीता के पहले अध्याय, जिसे "अर्जुन विषाद योग" भी कहा जाता है, गीता के संग्रह और महत्वपूर्णता का आदान-प्रदान करता है। यह अध्याय गीता का आरंभिक अध्याय है और इसमें महाभारत युद्ध के पहले अध्याय में आर्जवन की मानसिक और भावनात्मक स्थिति का वर्णन किया गया है। अर्जुन विषाद योग द्वारा, आर्जवन अपने परिवार, दोस्तों और गुरुओं के सामने युद्ध के लिए तैयार होने से पहले उबलते हुए मन की दुविधा, विपरीत भावनाएं और मानसिक दुख को व्यक्त करते हैं। वह अर्जुन का मानसिक और भावनात्मक संकट बताता है, जिसमें वह युद्ध करने के लिए स्वार्थी और दुखी होता है। अर्जुन का यह संकट गीता का मुख्य विषय बनता है और इसे विषाद योग के रूप में जाना जाता है। अर्जुन विषाद योग में, गीता के मुख्य पाठकों में से एक अर्जुन की मानसिक स्थिति, धर्म के महत्व और युद्ध के प्रति उसके संदेहों को समझने का अवसर मिलता है। अर्जुन विषाद योग में आगे बढ़ते हुए, अर्जुन अपने मानसिक और भावनात्मक दुख को व्यक्त करता है और यह संकट भावना और अस्थायी विकल्पों के कारण उसे युद्ध करने से इंकार करने की प्रवृत्ति देता है। वह यह समझने के लिए आरंभिक उपाय...