गीता का पांचवां अध्याय

 यह अध्याय "संन्यास योग" या "कर्मसंन्यास योग" कहलाता है। इसमें श्रीकृष्ण कर्मयोग और संन्यास की तुलना करते हैं और निष्काम कर्म को श्रेष्ठ बताते हैं।

मुख्य बिंदु

1. संन्यास बनाम कर्मयोग – अर्जुन के प्रश्न पर श्रीकृष्ण कहते हैं कि संन्यास (कर्म त्याग) और कर्मयोग (निष्काम कर्म) दोनों मोक्ष देते हैं, परंतु कर्मयोग श्रेष्ठ है क्योंकि यह बिना कर्तव्य छोड़े मोक्ष की ओर ले जाता है।

2. स्थितप्रज्ञ और ब्रह्मनिर्वाण – जो व्यक्ति फल की आसक्ति त्यागकर कर्म करता है, वह परम शांति (ब्रह्मनिर्वाण) प्राप्त करता है। वह स्वयं को कर्ता नहीं मानता और परमात्मा में स्थित रहता है।

निष्कर्ष

कर्म का त्याग नहीं, बल्कि फल की आसक्ति का त्याग श्रेष्ठ है। निष्काम कर्मयोग से मनुष्य जीवन-मुक्त होकर परम आनंद प्राप्त कर सकता है।





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