गीता का सोलहवां अध्याय
यह अध्याय मनुष्यों के दो प्रकार – दैवी (ईश्वरीय) और आसुरी (अधर्मी) प्रवृत्तियों का विस्तार से वर्णन करता है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि इन प्रवृत्तियों के आधार पर मनुष्य का स्वभाव और उसका जीवन-परिणाम तय होता है।
1. दैवी संपदा (ईश्वरीय गुण)
वे गुण जो मोक्ष की ओर ले जाते हैं:
अहिंसा, सत्य, क्रोध का न होना
त्याग, क्षमा, संयम
श्रद्धा, सहनशीलता, पवित्रता
भक्ति, सरलता, अभिमान रहित व्यवहार
करुणा, निडरता, परोपकार
2. आसुरी संपदा (अधर्मी गुण)
वे गुण जो बंधन और नरक की ओर ले जाते हैं:
अहंकार, क्रोध, कपट
क्रूरता, लोभ, अधर्म
दूसरों को नीचा दिखाना
नास्तिकता, स्वार्थीपन
छल-कपट और असत्य भाषण
3. निष्कर्ष
भगवान कहते हैं कि दैवी गुणों वाला व्यक्ति मुक्ति को प्राप्त करता है, जबकि आसुरी गुणों वाला व्यक्ति पुनः अधोगति को प्राप्त होता है। अतः अर्जुन को दैवी गुण अपनाने और आसुरी गुणों से दूर रहने का उपदेश दिया जाता है।
यह अध्याय हमें आत्म-संशोधन और धर्ममय जीवन की प्रेरणा देता है।
Comments
Post a Comment