हनुमान चालीसा (1श्लोक)
हनुमान चालीसा का पहला श्लोक एवं उसका विस्तृत विवेचन
श्लोक:
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मन मुकुर सुधारि।
बरनऊँ रघुबर बिमल जसु, जो दायक फल चारि॥
शब्दार्थ एवं व्याख्या
1. श्रीगुरु चरन सरोज रज
श्रीगुरु – पूजनीय गुरु (आध्यात्मिक मार्गदर्शक)।
चरन सरोज – गुरु के चरणों का कमल।
रज – चरणों की धूल।
यहाँ तुलसीदासजी अपने गुरु के चरणों की धूल को वंदन कर रहे हैं और उसे अत्यंत पवित्र मान रहे हैं।
2. निज मन मुकुर सुधारि
निज मन – अपना मन।
मुकुर – दर्पण।
सुधारि – शुद्ध या स्वच्छ करना।
कवि कह रहे हैं कि गुरु के चरणों की धूल से मैं अपने मन रूपी दर्पण को स्वच्छ करता हूँ, ताकि हनुमान जी की महिमा को सही तरह से समझ सकूँ और उसका वर्णन कर सकूँ।
3. बरनऊँ रघुबर बिमल जसु
बरनऊँ – वर्णन करता हूँ।
रघुबर – श्रीराम (रघुकुल के श्रेष्ठ)।
बिमल जसु – निर्मल यश (शुद्ध और पावन कीर्ति)।
अर्थात, अब मैं श्रीराम के निर्मल और पवित्र यश का गुणगान करता हूँ।
4. जो दायक फल चारि
जो – जो (जिसके द्वारा)।
दायक – देने वाला।
फल चारि – चार फल (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष)।
श्रीराम का यह यश चारों प्रकार के फल (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) देने वाला है।
विस्तृत विवेचन
हनुमान चालीसा का यह प्रथम श्लोक अत्यंत गहन अर्थ रखता है। इसमें तुलसीदासजी ने अपने गुरु को नमन करते हुए यह संदेश दिया कि किसी भी कार्य को शुरू करने से पहले गुरु का स्मरण करना अत्यंत आवश्यक है। गुरु के चरणों की धूल को मन रूपी दर्पण पर लगाकर उसे स्वच्छ करना, आध्यात्मिक रूप से खुद को शुद्ध करने का प्रतीक है।
इसके बाद वे भगवान श्रीराम के निर्मल यश का वर्णन करने की प्रतिज्ञा लेते हैं, जो कि सभी प्रकार के लौकिक और आध्यात्मिक फलों को देने वाला है। इस श्लोक से यह भी शिक्षा मिलती है कि गुरु कृपा के बिना कोई भी कार्य सफल नहीं हो सकता और भक्ति मार्ग में आगे बढ़ने के लिए श्रीराम और हनुमान जी की महिमा को हृदय में धारण करना आवश्यक है।
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